रविवार, जून 10, 2012

काशी का अस्सी: एक अलग किस्म का उपन्यास

- उमेश पाठक 


कहानियों के संस्मरणों और चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह का नया उपन्यास है : काशी का अस्सी। जिन्दगी और जिन्दादिली से भरा एक अलग किस्म का उपन्यास है। उपन्यास के परम्परित मान्य ढाँचों के आगे प्रश्न चिह्न।
पिछले दस वर्षों से ‘अस्सी’ काशीनाथ की भी पहचान रहा है और बनारस की भी। जब इस उपन्यास के कुछ अंश ‘कथा रिपोर्ताज’ के नाम से पत्रिका में छपे थे तो पाठकों और लेखकों मे हलचल सी हुई थी। छोटे शहरों और कस्बों में उन अंक विशेषों के लिए जैसे लूट-सी मची थी, फोटोस्टेट तक हुए थे, स्वंय पात्रों ने बावेला मचाए थे और मारपीट से लेकर कोर्ट-कचहरी की धमकियाँ तक दी थीं।


अब वह मुकम्मल उपन्यास आपके सामने है जिसमें पाँच कथाएँ हैं और उन सभी कथाओं का केन्द्र भी अस्सी है। हर कथा में स्थान भी वही, पात्र भी वे ही-अपने असली और वास्तविक नामों के साथ, अपनी बोली-बानी और लहजों के साथ। हर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे पर इन पात्रों की बेमुरव्वत और लट्ठ मार टिप्पणियाँ काशी की उस देशज और लोकपरम्परा की याद दिलाती है जिसके वारिस कबीर और भारतेन्दु थे !
उपन्यास की भाषा उसकी जान है-देशपन और व्यंग्य-विनोद में सराबोर। साहित्य की ‘मधुर मनोहर अतीव सुंदर’ वाणी शायद कहीं दिख जाय !
सब मिलाकर काशी नाथ की नजरों में ‘अस्सी’ पिछले दल वर्षों से भारतीय समाज में पक रही राजनीतिक-सांस्कृतिक खिचड़ी की पहचान के लिए चावल का एक दाना भर है, बस !

अस्सी का परिचय बकौल काशीनाथ सिंह 


मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है ! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् ‘परम’ (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ-
तो सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर-सा बायोडॉटा—कमर में गमछा, कन्धे पर लँगोट और  बदन पर जनेऊ—यह ‘यूनिफॉर्म’ है अस्सी का !


हालाँकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है। पैंट-शर्ट, जीन्स, सफारी और भी जाने कैसी-कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग ! लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो ! वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लँगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो, गमछा अपनी जगह अडिग है !
‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है ! चाहे होली का कवि-सम्मेलन हो, चाहे कर्फ्यू खुलने के बाद पी.ए.सी और एस.एस.पी. की गाड़ी, चाहे कोई मन्त्री हो, चाहे गधे को दौड़ाता नंग-धड़ंग बच्चा—यहाँ तक कि जार्ज बुश या मार्गरेट थैचर या गोर्बाचोव चाहे जो आ जाए (काशी नरेश को छोड़कर)—सबके लिए ‘हर हर महादेव’ के साथ ‘भोंसड़ी के’ का जय-जयकार !
फर्क इतना ही है कि पहला बन्द बोलना पड़ता है—जरा जोर लगाकर; और दूसरा बिना बोले अपने आप कंठ से फूट पड़ता है।
जमाने के लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा ‘आइडेंटिटी कार्ड’ है इसका ! 
नमूना पेश है—



खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला—‘किस दुनिया में हो गुरू ! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घण्टे-भर से पान घुला रहे हो ?’’
मोरी में ‘पंचू’ से पान की पीक थूककर बोले—‘देखौ ! एक बात नोट कर लो ! चन्द्रमा हो या सूरज—भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से ! समझे कुछ ?’
‘जो मजा बनारस में; न पेरिस में, न फारस में’—इश्तहार है इसका।
यह इश्तहार दीवारों पर नहीं, लोगों की आँखों में और ललाटों पर लिखा रहता है !
‘गुरू’ यहाँ की नागरिकता का ‘सरनेम’ है।
न कोई सिंह, न पांड़े, न जादो, न राम ! सब गुरू ! जो पैदा भया, वह भी गुरू, जो मरा, वह भी गुरू !
वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है यह :



गिरिजेश राय (भाकपा), नारायण मिश्र (भाजपा), अम्बिका सिंह (कभी कांग्रेस, अभी जद) तीनों की दोस्ती पिछले तीस सालों से कायम है और न आने वाली कई पीढ़ियों तक इसके बने रहने के आसार हैं ! किसी मकान पर कब्जा दिलाना हो, कब्जा छुड़ाना हो, किसी को फँसाना हो या जमानत करानी हो—तीनों में कभी मतभेद नहीं होता ! वे उसे मंच के लिए छोड़ रखते हैं...अस्सी के मुहावरे में अगर तीनों नहीं, तो कम-से-कम दो—एक ही गाँड़ हगते हैं।
अन्त में, एक बात और। भारतीय भूगोल की एक भयानक भूल ठीक कर लें। अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं। अस्सी ‘अष्टाध्यायी’ है और बनारस उसका ‘भाष्य’ ! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से ‘पूँजीवाद’ के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी ‘टीका’ हो जाए...मगर चाहने से क्या होता है ?
अगर चाहने से होता तो पिछले खाड़ी युद्ध के दिनों में अस्सी चाहता था कि अमरीका का ‘व्हाइट हाउस’ इस मुहल्ले का ‘शुलभ शौचालय’ हो जाए ताकि उसे ‘दिव्य निपटान’ के लिए ‘बहरी अलंग’ अर्थात् गंगा पार न जाना पड़े...मगर चाहने से क्या होता है ?

प्रस्तावना: 


तो मित्रो, यही अस्सी मेरा बोधगया है और अस्सीघाट पर गंगा के किनारे खड़ा वह पीपल का दरख्त बोधिवृक्ष, जिसके नीचे मुझे निर्वाण प्राप्त हुआ था !
अन्तर्कथा यह है कि सन् ’53 में मैं गाँव से बनारस आया था। मँझले भैया रामजी सिंह के साथ। आगे की पढ़ाई के लिए। उन्हें बी.ए. प्राइवेट पढ़ना था घर की खेती-बारी सँभालते हुए। और मुझे इंटर में। वे बेहद सख्त गार्जियन थे—कुछ-कुछ प्रेमचन्द के ‘बड़े भाई साहब’ की तरह ! इस बात का भी मुझे आश्चर्य होता था और उन्हें भी कि अपने अध्यापकों से अधिक ज्ञान के बावजूद, अपने ही मित्रों को पढ़ा-पढ़ाकर पास कराने के बावजूद वे खुद फेल कैसे हो जाते हैं ?
उन्होंने एक बार अपने पास चेले को पकड़ा। रिजल्ट आया ही आया था। उन्होंने पूछा, ‘‘बे लालजी ! हम तुझे पढ़ाए, जो-जो नहीं आता था तुझे सब बताए, लिखाए, रटाए; तू पास हो गया, हम कइसे फैल हो गए ?’ लालजी बोले—‘गुरू, ऐसा है कि आप जो पढ़ाए, वह तो हम पढ़े ही। बाकी आपकी चोरी-चोरी भी कुछ पढ़े थे।’


उन्हें उसके उत्तर से संतोष नहीं हुआ। मुझसे पूछा—‘अन्दाजा लगाओ तो जरा ! क्या बात हो सकती है ? इसमें अन्दाजा लगाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन मैं अन्दाजा लगाने लगा और नहीं लगा पाया। कारण, कि भैया के शब्दकोश में व्याकरण के लिए कोई जगह नहीं थी ! ‘ने’, ‘में’, ‘का’, ‘पर’, ‘से’ आदि को वे फालतू और बेमतलब समझते थे ! सीधे-सादे वाक्य में अड़ंगेबाजी के सिवा और कोई काम नहीं नजर आता था इनको ।...लेकिन यह बताता तो लात खाता !
बहरहाल, बात ‘निर्वाण’ की।
एक दिन भैया ने कहा—‘तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है। वह बातचीत होने लायक होनी चाहिए। कोई तुमसे अंग्रेजी में कुछ पूछे और तुम उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने लगो, यह अच्छा नहीं। तुम अस्सी के चुडुक्कों के साथ खेलना छोड़ो और चलो, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करो।’



भैया मुझे इसी पीपल के पास ले आए। शाम के समय। घाट पर भीड़-भाड़ कम थी। उन्होंने मुझे एक सीढ़ी के पास बिठा दिया और कहा—‘डेली शाम को यहाँ आकर अभ्यास करो !—ऐसे !’
वे पन्द्रह गज दूर खड़े हो गए—अटेंशन की मुद्रा में और पेड़ से बोले—‘व्हाट इज योर नेम ?’ फिर पेड़ के पास ले गए और सामने देखते हुए उसी मुद्रा में बोले, ‘सर, माई नेम इज रामजी सिंह !’ फिर वहाँ से पन्द्रह गज दूर—व्हाट इज योर फादर्स नेम ?’ फिर पेड़ के पास से—‘सर, माई फादर्स नेम इज श्री नागर सिंह !’ इस तरह वे तब तक पीपल के पास आते-जाते रहे, जब तक पसीने-पसीने नहीं हो गए !
‘हाँ, चलो अब तुम ?’ वे सीढ़ी पर मेरी जगह बैठकर सुस्ताने लगे।
मित्रो ! भगवान झूठ न बुलवाएँ तो कहूँ कि अंग्रेजी बोलना तो मुझे नहीं आया, हाँ, इतना जरूर समझा कि पसीने से ज्ञान का बड़ा गहरा सम्बन्ध है !



इसीलिए जब लोग पूछते हैं कि तुम्हें इतना अधिक पसीना क्यों होता है या बूढ़े बकरे की तरह गन्धाते हो तो मैं उनकी मूर्खता पर हँसकर रह जाता हूँ। अरे भले आदमी, ज्ञानी को ज्ञानोद्रेक से पसीना नहीं आएगा तो क्या कँपकँपी छूटेगी ?
लेकिन साहब, मेरे ज्ञान की बधिया बैठा दी मुहल्ले के ‘आदिवासियों’ ने।
इधर ‘प्रामाणिक अनुभूती’ और उधर ‘भोगा हुआ यथार्थ’ और यथार्थ को पसीने से परहेज !
एक थे हमारे बापजान जो पैना उठाए हमें किताबें-कापियों में जोते रखते थे—‘सालो, खेती तो गई सरकार के ‘उसमें’। अगर यह भी नहीं करोगे तो भीख माँगोगे !’ दूसरी ओर मुहल्ले के बाप थे जो अपने बच्चों का स्कूल में नाम लिखाते थे—पढ़ने के लिए नहीं, सरकार की ओर से मुफ्त बँटने वाली ‘दलिया’ के लिए ! वे केवल ‘रेसस पीरियड’ में ही स्कूल में नजर आते।
उनका एक जीवन-दर्शन था—‘जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?’



पूरा मुहल्ला पीढ़ियों से उसी शैली से जीता चला आ रहा था—गाता-बजाता, झूमता, मदमाता ! किसी के पास कोई डिग्री नहीं, रोजगार नहीं, व्यवसाय नहीं, काम नहीं; परलोक सिधारते समय पंडित महाराज ने पत्रा-पोथी लपेटे हुए एक लाल बेठन खोंस दिया बेटे की काँख में—बस ! वे तख्त पर बेठन रखे हुए जनेऊ से पीठ खुजा रहे हैं और जजमान का इन्तजार कर रहे हैं !
जजमान रोज-रोज नहीं आते, ग्रह-नक्षत्र भी रोज-रोज खराब नहीं होते, मुंडन, शादी-ब्याह, जनेऊ जैसे संस्कार भी रोज-रोज नहीं होते और न रोज-रोज फत्ते गुरु की कन्धे पर कुम्हड़ा होता है। फत्ते गुरू कुम्हड़े का पूरा वजन उठाए हुए मुहल्ले-भर को सुनानेवाली आवाज में आत्मलाप करते आ रहे हैं—‘पालागी फत्ते गुरू !’ जय हो जजमान !’’ सट्टी गए थे का गुरू ?’ कवन भँड़ुआ सट्टी जाता है जजमान ?’ अरे तो इतना बड़ा कोंहड़ा ? हफ्ते-भर तो चलेगा ही गुरू !’ हफ्ते-भर तुम्हारे यहाँ चलता होगा। यहाँ तो दो जून के लिए भी कम है !’



मुहल्ला अपने दरवाजों, खिड़कियों, छतों से आँखें फाड़ फत्ते गुरू का कोंहड़ा देख रहा और उनके भाग्य से जल-भुन रहा है। सन्तोष है तो यह कि आज का दिन फत्ते गुरू का, कल का दिन किसी और गुरू का ! कौन जाने हमारा ही हो ?
कहते हैं, बुढ़ापे में तुलसी बाबा कुछ-कुछ ‘पिड़काह’ और चिड़-चिड़े हो चले थे। मुहल्ले वालों ने उनसे जरा भी छेड़छाड़ की, पिनक गए और शाप दे डाला—‘जाओ, तुम लोग मूर्ख दरिद्र रह जाओगे !’
मित्रो, मेरा मतभेद है इससे। शान्तिप्रिय द्वेवेदी को जितना तंग किया मुहल्ले ने, उससे अधिक तंग तो नहीं ही किया होगा बाबा को और अगर उन्हें शाप ही देना था तो जाते-जवाते इनके हाथ ‘मानस’ पोथी क्यों पकड़ा जाते ? फिर भी ये कहते हैं, तो हम मान लेते हैं; लेकिन सरापकर भी क्या कर लिया बाबा ने ? माथे पर चंदन की बेंदी, मुँह में पान और तोंद सहलाता हाथ ! न किसी के आगे गिड़गिड़ाना, न हाथ फैलाना। दे तो भला, न दे तो भला ! उधर मंदिर, इधर गंगा; और घर में सिलबट्टा ! देनेवाला ‘वह’; जजमान भोंसड़ी के क्या देगा ? भाँग छानी, निपटे और देवी के दर्शन के लिए चल पड़े।
चौके में कुछ नहीं, मगर जिए जा रहे हैं—ताव के साथ ! चेहरे पर कोई तनाव नहीं, कहीं कोई फिक्र नहीं और उधर से लौटे तो साथ में कभी-काल, एक जजमान—‘सुन बे रजुआ, खोल केवाड़ी, आयल हौ जजमान चकाचक !’’
तो साहब ! कच्ची उमर और बाला जोबन ! अपन को भा गया यह दर्शन !



काहे की है-है और काहे की खट्-खट् ! साथ तो जाना नहीं कुछ ! फिर क्यों मरे जा रहे हो चौबीसों घंटे ? सारा कुछ जुटाए जा रहे हो, फिर भी किसी के चेहरे पर खुशी नहीं ! यह नहीं है, तो वह नहीं है ! इसे साड़ी, तो उसे फ्रॉक, तो इसे फीस, तो उसे टिफिन, तो इसे दवा, तो उसे टॉनिक, तो इसे...कुछ करो तब भी और न करो तब भी यह दुनिया चल रही है और चलती रहेगी...
प्यारेलाल ! अपनी भी जिन्दगी जियो, दूसरों की ही नहीं !
ऐसे में ही गया था सब्जी लेने अस्सी पर ! लुंगी और जाकिट पहने हुए !
लगभग दो बजे दोपहर।
सन् ’70 के जाड़ों के दिन।
सलीम की दुकान पर खड़ा हुआ ही था कि सड़क से आवाज आई—डॉक्टर !
मैंने मुड़कर देखा तो एक परिचित मित्र ! रिक्शे पर ! इससे पहले एक-दो बार की ही भेंट थी उससे।
मैं पास पहुँचा तो उसने पूछा, ‘आवारगी करने का मन है डॉक्टर ?’
‘क्या मतलब ?’



‘कहीं चलना चाहते हो ? कलकत्ता, बम्बई, दार्जलिंग, कालिंगपाँग, नेपाल कहीं भी !’
मैं चकित ! बोला—‘रुको ! सब्जी देकर आते हैं तो बात करते हैं।’
उसने रिक्शे पर बैठे-बैठे मेरा हाथ पकड़ा—‘एक बात का उत्तर दो। महीने में कितने दिन होते हैं ? तीस दिन। इनमें से कितने दिन तुम्हारे अपने दिन हैं ? ‘अपने’ का मतलब जिसमें माँ-बाप, भाई-बहन, बीवी, बेटा-बेटी किसी का दखल न हो। जैसे चाहो, वैसे रहो, जैसा चाहो, वैसा जियो।’
मैं सोच में पड़ गया।
‘एक दिन, दो दिन, तीन दिन ?’ वह उसी गम्भीरता से बोलता रहा।
मैं चुप।



‘सुनो ! महीने के सत्ताइस दिन दे दो बीवी को बाल-बच्चों को, पूरे खानदान को ! उनसे कहो कि भैया, ये रहे तुम्हारे दिन ! लेकिन ये तीन दिन मुझे दे दो। मेरी भी अपनी जिन्दगी है, उसके साथ जुल्म न करो, समझा ?’
‘और सुनो ! कार्यक्रम बनाकर जीने में तो सारी जिन्दगी गँवा रहे हैं हम ! हम घर से निकलते ही कहते हैं कि सुनो, अमुक जगह जा रहे हैं और इतने बजे आएँगे। और कहीं बाहर जाना हुआ तो हफ्ते-भर के राशन-पानी, साग-सब्जी का बन्दोबस्त करके जाते हैं !...इन सबका कोई मतलब है क्या ? आवारगी करने का भी कार्यक्रम बनाया जाता है क्या ?’
‘ठीक है यार ! मैं सलीम को बता तो दूँ कि सब्जी पहुँचा के घर पर बोल देगा !’
‘लो, फिर वही बात ! अरे, जिन्हें खाना है, वे ले जाएँगे; चलो तुम !’
‘अच्छा चलो !’ मैं भी बगल के रिक्शे पर बैठ गया—‘तुम भी क्या कहोगे ?’



और साहब ! मैंने सोचा था कि शहर से ही कहीं सिनेमा वगैरह देख-दाखकर शाम नहीं तो रात तक लौट आएँगे, लेकिन पहुँच गए पंजाब मेल से सचमुच कलकत्ता, वहाँ के डायमंड हार्बर, फिर वहाँ से काकद्वीप। छककर रास्ते-भर खाया-पिया—मौज मनाई ! पसीने के बगैर जिन्दगी का मजा लिया।...वही लुंगी और जाकिट, हवाई चप्पल, जेब में दस नए पैसे। आन का आँटा, आन का घी। भोग लगावैं बाबाजी !
पाँच दिन बाद लौटे थे घर !
मौज तो बहुत आई, लेकिन लौटानी ट्रेन में ही एक दूसरा ज्ञानोदय हुआ।
जो भी तुम पर पैसा खर्च करता है, वह तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। प्यारेलाला ! ट्रेन छूटनेवाली है, लपक के जरा दो टिकट तो ले आओ !...जरा उस तरफ बैठ जाओ तो थोड़ा बदन सीधा कर लें...यार, कैसे दोस्त हो, कहीं से एक गिलास पानी नहीं पिला सकते ?...जरा वो तौलिया तो पकड़ाना, ‘फ्रेश’ हो लिया जाए ?...गुरू, सिगरेट तो है मगर माचिस छूट गई, डिब्बे में नजर दौड़ाओ ! कोई-न-कोई जरूर बीड़ी सिगरेट पी रहा होगा !...अगर आप दोस्त के लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे ?



घर में ऐसा कुहराम मचा था कि न पूछिए ! कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और बीवी ने बेवा होने की पूरी तैयारी कर ली थी !
मुझे जल्दी ही अहसास हो गया कि माया-मोह के जंजाल में फँसा मैं—अस्सी का प्रवासी—इस दर्शन के काबिल नहीं !
अस्सी पर प्रवासियों की एक ही नस्ल थी शुरू में—लेखकों-कवियों की !
आजादी के बाद देश में जगह-जगह ‘केन्द्र’ खुलने शुरू हो गए थे—‘मुर्गी-पालन केन्द्र’, ‘मत्स्य पालन केन्द्र’, ‘सुअर-पालन केन्द्र’, ‘मगर-घड़ियाल-पालन केन्द्र’। इन कवियों-लेखकों ने भी अपना एक केन्द्र खोल लिया—केदार चायवाले की दुकान में। ‘कवि-पालन केन्द्र’। कोई साइनबोर्ड नहीं था, लेकिन जनता इसे इसी रूप में जानती थी। सुबह हो या दोपहर या शाम—केदार, विजयमोहन, अक्ष्योभ्येश्वरी प्रताप, शालिग्राम, अधीर, आनन्द भैरवशाही, विद्यासागर नौटियाल, विश्वनाथ त्रिपाठी (देहलवी), श्याम तिवारी, विष्णुचन्द्र शर्मा, बाबा कारन्त—इनमें से किसी को भी समूह में या अलग-अलग यहीं पाया जाता था !



इसके मानद इंचार्ज थे समीक्षक नामवार सिंह और पर्यवेक्षक थे त्रिलोचन। ये कवि प्रायः यहीं से ‘काव्य-भोज’ के लिए ‘तुलसी पुस्तकालय’ या ‘साधु वेला आश्रम’ की ओर रवाना होते।
मगर हास्य ! ’60 के शुरू होते-होते भी ‘फुर्र’ हो गए और केन्द्र भी टूट गया ! 
सन् ’65 के आस-पास जब धूमिल का आविर्भाव हुआ तो उसने गुरु के चरण-चिह्नों पर चलते हुए केदार चायवाले के सामने हजारी की दुकान को ‘केन्द्र’ बनाने की कोशिश की। हजारी के बगल में कन्हैया हलवाई की दुकान। वह कन्हैया के यहाँ से चार आने की जलेबी लेता और चार आने का सेव-दालमोठ और हजारी की दुकान में आ बैठता। इधर-उधर से कवियाये दूसरे लोग भी आते और नागानन्द भी। कवियों की नज़र अखबार या बहस पर होती, नागानन्द की जलेबी-नमकीन के दोनों पर ! 
ऐसे में केन्द्र क्या चलता !



मगर बाद के कई वर्षों तक—जिस प्रकार गोला दीनानाथ के इलाके में घुसते ही मसालों की गन्ध से नाक परपराने लगती है, उसी प्रकार अस्सी पर खड़े होने वाले किसी भी आदमी के कान के पर्दे काव्य-चर्चा से फटने लगते थे। धूमिल काव्य द्रोहियों के लिए परशुराम था और उसकी जीभ फरसा !
अस्सी से धूमिल क्या गया, जैसे आँगन से बेटी विदा हो गई। घर सूना और उदास।
इधर सुनते हैं कि कोई बुढ़ऊ-बुढ़ऊ से हैं कासीनाथ-इनभर्सीटी के मास्टर जो कहानियाँ-फहानियाँ लिखते हैं और अपने दो-चार बकलोल दोस्तों के साथ ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर ‘राजेश ब्रदर्स’ में बैठे रहते हैं ! अकसर शाम को ! ‘ए भाई ! ऊ तुमको किधर से लेखक-कवि बुझाता है जी ? बकरा जइसा दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाने से कोई लेखक कवि न थोड़े नु बनता है ? देखा नहीं था दिनकरवा को ? अरे, उहै रामधारी सिंघवा ? जब चदरा-ओदरा कन्हियाँ पर तान के खड़ा हो जाता था—छह फुट ज्वान; तब भह्-भह् बरता रहता था। आउर ई भोंसड़ी के अखबार पर लाई-दाना फइलाय के, एक पुड़िया नून और एक पाव मिरचा बटोर के भकोसता रहता है ! कवि-लेखक अइसै होता है का ?
सच्चा कहें तो नमवर-धूमिल के बाद अस्सी का साहित्य-फाहित्य गया एल.के.डी. (लौंडा के दक्खिन) !’’
मित्रो, इमर्जेंसी के बाद और ’80 के आस-पास से गजब हो गया !



भारत पर तो बेशक हमले हुए—यवनों के, हूणों के, कुषाणों के, लेकिन अलग-अलग और बारी-बारी, मगर अस्सी पर एक ही साथ कई राज्यों और जिलों से हमले हुए—आरा, सासाराम, भोजपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया जाने कहाँ-कहाँ से ‘जुवा’ लड़के युनिवर्सिटी में पढ़ने आए और चौराहे पर डेरा-डंडा गाड़ चले !
इनमें नई नस्लें थीं !
एक नस्ल पैदा हुई ‘फाइन आर्ट्स’ के शौक से ! ये लड़के ‘मारवाड़ी सेवा संघ’ के चौतरे पर पेंसिल और स्केचबुक लिये बैठे रहते हैं और ‘संघ की ओर से बँटनेवाली खिचड़ी या रोटियों के इन्तजार में बैठी या लेटी गायों, कुत्तों और भिखमंगों कि चित्र बनाया करते हैं !
दूसरी नस्ल ‘तुलसीघाट’ पर आयोजित होने वाले ‘ध्रुपद मेला’ से निकली ! यह गायकों-वादकों और उनकी कला पर फिदा होकर सिर हिलानेवालों की नस्ले हैं ! ये कढ़ाई किए हुए रंग-बिरंगे कुर्ते और चूड़ीदार पाजामा पहने, कन्धे पर झूलते लम्बे बाल बढ़ाए किसी गुरू या चेली के साथ बगल में तानपूरा दबाए इधर-उधर आते-जाते नजर आते हैं।
तीसरी नस्ल और भी जालिम है—पत्रकारों की ! तलवार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ वालो की। ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है ! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं ! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है !
एक चौथी नस्ल भी है गोवर्धनधारियों की जो कानी उँगली पर ‘राष्ट्र’ उठाए किसी चेले के ‘हीरो-हाण्डा’ पर दस बारह साल से मुस्की मार रहे हैं। लेकिन इनके बारे में बाद में !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें