सोमवार, जून 20, 2011

On Fathers day...

मैंने देखा ,
दर्द से तड़पते बूढ़े बाप को ,
उसके आंसुओ में अपने आपको ,
क्यों झेलता है वो रिस्तो के शाप को .
इन्सान खो देता है रिस्तो में अपने आपको ,
मैंने देखा है
उसके पथराई आँखों के सपनों को ,
उसके भूले बिसरे अपनों को ,
तिनका-तिनका बिखरे अरमानो को ,
तिल तिल क्र मरते स्वाभिमानो को ,
मैंने देखा है
जो निभाते है हर रिश्ते चुपचाप ,
अपने लिए न रखते कोई हिसाब ,
फिर भी उनकी इज्जत बेलिबास ,
मैंने देखा है ,
बाप के पसीने से रिस्तो के लहू बनते है ,
उसके अरमानो तले परिवार के सपने सजते है ,
उस बाप के सपने पानी से बहते है ,
जिस सपने और खून से हम बनते है!
मैंने देखा है ,
दर्द से तड़पते बूढ़े बाप को !

(sabhar: Arvind Yogi ji)