गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

बहुत खूबसूरत हो तुम !


बहूत खूबसूरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !

कभी मैं जो कह दूं मोहब्बत है तुम से !

तो मुझको खुदाया गलत मत समझना !

के मेरी जरुरत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !

है फ़ुलों की डाली, ये बाहें तुम्हारी !

है खामोश जादू निगाहें तुम्हारी !

जो काटें हों, सब अपने दामन में भर लूं !

सजाउं मैं इनसे ये राहें तुम्हारी !

नज़र से जमाने की खुद को बचाना !

किसी और से देखो दिल न लगाना !

के मेरी अमानत हो तुम !बहुत खूबसूरत हो तुम !

है चेहरा तुम्हारा के दिन है सुनेहरा !

और उस पर ये काली घटाओं का पेहरा !

गुलाबों से नाजु़क मेहकता बदन है !

ये लब है तुम्हारा के खिलता चमन है !

बिखेरो जो जु़ल्फ़ें तो शरमाये बादल !

ये मौसम भी देखे तो हो जाये पागल !

वो पाकीजा़ मूरत हो तुम !बहुत खूबसूरत हो तुम !

मोहब्बत हो तुम, बहुत खूबसूरत हो तुम !

जो बन के कली मुस्कूराती है अक्सर !

शबे हिज्र में जो रुलाती है अक्सर !

जो लम्हों ही लम्हों मे दुनिया बदल दे !

वो पाकीजा़ मुरत हो तुम !बहुत खूबसूरत हो तुम !



( "सिराजे हिंद" कहे जाने वाले शहर जौनपुर के मशहूर शायर ,शायर जमाली की ये ग़ज़ल खूबसूरती को एक अलग अंदाज़ में पेश करती है,आप भी महसूस करिए- उमेश पाठक )

मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

Important Terms in Advertising :Key words

1. Above-the-line cost: A budgeted expenses in television production (e.g., producers, directors, cast, script etc.).2. Account: A general term for the business relationship existing between an advertising agency and its clients. A client of an advertising agency.3. Account conflict: The opposing interests that occur when an advertising agency accepts competing clients.4. Account executive: An executive responsible co-coordinating an account.5. AD: Art director or Assistant director.6. Ad: Advertisement.7. Ad copy: The portions of an advertisement, commercial, or promotional piece.8. Adman: A person working in the advertising industry.9. Below the line cost: Cost that is not included in above-the-line items (e.g. props, transportation, set construction etc.)10. Brand: A graphic symbol, trade name, or combination of both that distinguishes a product or service of one seller from those of others.11. Brand name: A word or group of words, usually trademarked, that identify a product or service.12. Brand image: The pattern of feelings, associations, and ideas held by the public generally in regard to a specific brand. It is also called Brand Personality.13. Promotion: An effort, usually temporary, to create interests in the purchase of a product or service by offering extra values; includes temporary discounts, allowances, premium offers, coupons, contests etc.14. Positioning: It is strategic placement of products, ideas, services in the market to create a distinct brand image in the same segment.15. Segment: A market segment consists of a group of customers who share a similar set of wants.Example: A car company might say that it would target young, middle-income car buyers. The problem is that the young, middle-income buyers will differ about what they want in a car. Some will want a low-cost car and others will want an expensive car. Young, middle-income car buyers is a sector. Young, middle –income car buyers who want a low-cost car is a segment.16. Sponsor: Generally, an advertiser that pays for broadcast time. An advertiser that purchases an entire program.17. Sponsored program: A TV or Radio program paid for by one or more advertisers, as opposed to a sustaining program.18. Sustaining program: A TV or radio program supported by a commercial station or networks, without sponsorship by an advertiser, usually scheduled in the public interests.19. Target Market: A target market is the market segment to which a particular product is marketed.20. Marketing: The business activities that affect the distribution and sales of goods and services from producer to consumer; including product or service development, pricing, packaging, advertising, merchandising, and distribution.21. Brand loyalty: The consistent purchase and use of a specific product by a consumer over a period of time.22. USP: The original and unique benefit claimed for an advertised product or service.23. Slogan: A sentence or phrase used consistently in advertising to identify an advertiser’s product or services.24. Logo: A brand name, publication title, or the like, presented in a special lettering style or typeface and used in the name of a trademark.25. Propaganda: A communication intended to influence, belief and action, whether true or false information is contained in such communication. Ex: Every God-fearing/God-believing person should support us to free the J&K from the oppressions of the Govt. of India.26. Publicity: Information regarding a person, corporation, product etc। released for non-paid use by the mass media; often disguised as news.

सोमवार, अप्रैल 27, 2009

क्या है ज़िन्दगी?


उमेश पाठक
क्या है ज़िन्दगी?अपने आप में ये बड़ा सवाल है! लगातार जीते चले जाना उतार -चढाव को झेलना या जिंदादिली?जवाब कोई एक नही हो सकता ,ये सारी बातें जिंदगी में शामिल है ,वास्तव में जिंदगी एक फूल के जैसी है,जिसके अलग-अलग हिस्सों में कई रंग होते हैं!अगर उन्हें अलग कर दिया जाए तो उनकी खूबसूरती ख़त्म हो जाती है ,वैसे ही दुःख-सुख ,उतार-चढाव,लाभ-हानि,जीवन-मरण ,खोना-पाना और मिलना-बिछड़ना जिंदगी के रंग हैं!ज़िन्दगी की रौनक सभी रंगों से है!अलग -अलग सभी रंग सुंदर ज़रूर होते हैं लेकिन उनमे इन्द्रधनुष वाली बात नही आती!यही हाल ज़िन्दगी का भी है !सभी रंग मिल कर जिंदगी को "ज़िन्दगी"बनाते हैं!कुछ शायरों की नज़र में जिंदगी-



  • जिंदगी कैसी है पहेली हाय,कभी ये हसाए कभी ये रुलाये .....


  • ज़िन्दगी प्यार का गीत है ,जिसे हर दिल को गाना पड़ेगा...


  • जीवन क्या है ,चलता फिरता एक खिलौना है,आती साँस को पाना जाती साँस को खोना है.....


  • ये जीवन है,इस जीवन का यही है -यही है रंग-रूप....


  • ज़िन्दगी का सफर ,है ये कैसा सफर, कोई समझ नही कोई जाना नही.......

कुल मिला कर सभी रंग ज़िन्दगी में शामिल है और हमें उसे उसी वास्तविक रूप में स्वीकार करना चाहिए,तभी हम जिंदगी को समझ सकते हैं और उसका आनंद ले सकतें हैं!

शुक्रवार, अप्रैल 24, 2009

समेट लो,कुछ दे कर जा रहा है..गुजरता पल !


उमेश पाठक

मिनट ,घंटा ,दिन,महीने, साल गुजरते चले जाते हैं-हम चाहें या न चाहें!सुख-दुःख,अच्छा-बुरा कुछ न कुछ ज़रूर होता है बीते सालों में ,हर किसी के साथ!कभी कोई कड़वी याद हमारा मन कसैला करदेती है तो कभी सुखद दिनों की यादे अपनी बौछारों से हमें भिगो जाती हैं!हर पल हमें आगे बढ़ने के लिए कोई न कोई तरीका ज़रूर बता जाता है,हाँ कभी हम उसे समझ लेते हैं और कभी समझ ही नही पातें!
जब कभी धुप ने शिद्दत से सताया हमको ,याद एक पेड़ का साया बहुत आया हमको! ये सभी अनुभव हमें वास्तव में जीना सीखा देते हैं!जिंदगी से डर-डर के क्या होगा,कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा.वक्त की सच्चाई से रूबरू करातेहैं! कुछ फिल्मी गीत भी काफी महत्व के हैं,वक्त की कीमत और महत्व को बताते कुछ फिल्मी गीत ध्यान देने योग्य हैं-आइये एक नजर डालते हैं-

  • वक्त के सितम कम हसीं नही,आज हैं यहाँ कल कही नही वक्त हैं बड़े अगर मिल गएँ कहीं.....

  • वक्त ने किया क्या हसीं सितम,तुम रहे न तुम हम रहें न हम
  • नदिया चले ,चले रे धारा.....तुमको चलना होगा...
  • आने वाला पल जाने वाला है.....
  • समय ओ धीरे चलो ,बुझ गयी रह की छावं .....
  • ढलता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जाएगा..
  • समय से कौन लड़ा मेरे भाई ...

वक्त ने हमें निकम्मा कर दिया ग़ालिब वरना हम भी आदमी थें काम !मित्रों हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें ,वक्त को रोक नही सकतें,हाँ वक्त के साथ चलने की कोशिश ज़रूर की जा सकती है!ये कोशिश ही हमें उम्मीद की और ले जाती है!

यादें !


उमेश पाठक

जिद थी पागलपन की हद तक,दर्द का दर्पण साथ लिए !

जाने कब हम निकल पड़े थे , ज़ख्मो की सौगात लिए !

मन को बहुत संभाला लेकिन ,दिल के हाथों हार गया ,

यादों की लश्कर का खाली ,आज न कोई वार गया !

कर बैठा मै आत्मसमर्पण ,वक्त से कुछ लम्हात लिए!

रोजी -रोटी की उलझन में,अरमानो का खून हुआ ,

जीवन के इस पथ पर जीना ,जैसे एक जूनून हुआ,

अपने हुए पराये कितने छोटी -छोटी बात लिए!

मन की फुलवारी को कितने ,रिश्तो के अनुबंध मिले ,

"शब्द" नही दे पाए अक्सर ऐसे भी सम्बन्ध मिले ,

महक उठी रिश्तो की कालिया,नाज़ुक एहसासात लिए !

आज की शब् यादो की शब् है,फूल बने है अंगारे ,

यादों की सहराओं में हम ,चलते -चलते ,थक -हारे,

चाँद सरीखे चेहरे आयें ,ग़म की काली रत लिए!

जिद थी पागलपन की हद तक,दर्द का दर्पण साथ लिए !
जाने कब हम निकल पड़े थे , ज़ख्मो की सौगात लिए !



(यादे हर इंसान को अतीत में ले जाती है,लेकिन सामने वर्तमान पुकार रहा होता है,हम वक्त के साथ जीने लगते है ....पर यादें कही न कही से हवा के झोंके सी हमें झकझोर जाती हैं - उमेश पाठक )



सोमवार, अप्रैल 20, 2009

दवा को दर्द की तलाश है!

उमेश पाठक
ऐसा कौन सा इन्सान होगा जिसे दर्द से कष्ट नही मिलता होगा!आदिकाल से ही हम सुखों की चाह में निरंतर दुःख झेलते आ रहे हैं!इस चाह की बजाय अगर दुखो को ही प्यार से अपना लिया जाए तो शायद उनसे मिलने वाली पीडा कम हो जाए! दर्द से परेशान हो कर जब ख़ुद को देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे दर्द का हिस्सा मै ख़ुद हूँ,कुछ समय पहले दर्द मेरा हिस्सा हुआ करता था!हम दर्द से भाग कर दवा की तलाश करते है,लेकिन दवा के बारे में कभी नही सोचते ..कभी -कभी यही दर्द बड़े काम का होता है और सकारात्मक परिणाम भी दे जाता है !दुनिया के सभी महान विभूतियों का जीवन दर्द से भरा रहा है!संसार की सभी मुख्य रचनाये दर्द के कारन ही संभव हो सकीं !
हर एक दर्द को दवा की आस है,
पर अब दवा को भी दर्द की तलाश है!

रविवार, अप्रैल 19, 2009

पहचान का संकट बनाम दिल्ली प्रवास !


उमेश पाठक
यूँ तो हर ओर है बेशुमार आदमी,


फ़िर भी तनहाइओं का का शिकार आदमी !




दिल्ली में एक दुकान पर जहा मेरा लगभग रोज का आना-जाना था ,एक आदमी को अक्सर देखता था!सम्बन्ध केवल एक-दुसरे को देखने का ही था,एक दिन करीब ४ साल के बाद हमारा परिचय होता है और वो व्यक्ति बताता है-मै दिल्ली कोर्ट में जज हूँ " और मै स्तब्ध रह जाता हूँ.सोचता इस शहर के बारे में ......पहचान का संकट कितना बड़ा है यहाँ! करोड़ो कमाने के बाद भी आप एक गुमनाम ज़िन्दगी जीने के लिए अभिशप्त हैं!एक अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा वाचमैन न हो तो सभी सभ्य समाज के लोग जो अपार्टमेन्ट कल्चर के आदि है ,उनको अपनी चिट्ठी पत्री भी न मिले! एक और घटना है-मेरे साथ एक साहब ने तीन साल काम किया फ़िर हमारा संसथान बदल गया,यानि हम अलग -अलग जगह पर काम करने लगे!एक दिन मैंने उनको फोन किया तो उधर से आवाज़ आई-कौन? मैंने परिचय दिया तो उन्होंने कहा क्या काम है? बड़े दुःख ओर क्रोध में मैंने कहा -इस दुनिया में अभी भी कुछ लोग ऐसे है जो मानवता के नाते हाल चाल पूछ लिया करते है,यहाँ तो सारा रिश्ता काम से या काम तक ही है !यह तो एक छोटा सा उदहारण भर है ,देश के सभी मेट्रो शहरों का यही हाल है!छोटे शहरों में ये समस्या इतनी बड़ी नही है,अभी भी लोगों में एक दुसरे के लिए सम्मान (दिखावे के लिए ही सही )बरकरार है !यहाँ दिखावा मात्र भी नही है !पता नही किस गुमान में खोई है हमारी महानगरीय सभ्यता ,जहा इंसान को ढूढने की ज़रूरत पड़ती है !......अफ़सोस फ़िर भी नही मिलता !बशीर बद्र ने ठीक कहा है-


शहर में घर मिले,घरो में तख्तिया ,

तख्तियों पर ओहदे मिलें ,

पर ढूढे से भी ,कोई आदमी नही मिला!

गुरुवार, अप्रैल 16, 2009

रघुकुल के राम !


मिथक राम है-राम नही थे,कल कह दोगे श्याम नही थे !
मेरा मन तो ये कहता है,मिथ रघुकुल के राम नही थे!
सरयू तट का ताना -बना नगर अयोध्या बड़ा पुराना ,
ज्येष्ठ पुत्र रजा दशरथ के ,रामचंद्र का राजघराना!
राम सूर्य थे सूर्यवंश के ,अमर्यादित नाम नही थे!
सदियों लिखा,हाल ने लिखा,जिन्हें हजारो साल ने लिखा,
दौर हरेक हर काल ने लिखा,अल्लामा इक़बाल ने लिखा !
राम इमामे हिंद हुए हैं, धूर्त कहे इमाम नही थे !
लोक ज्ञान निर्वात करेंगे ,शास्त्र ज्ञान की बात करेंगे,
घट -घट में जब राम बसे है,राम पे क्या शास्त्रार्थ करेंगे!
भोतिक सुख पाने वालो में ,अध्यात्मिक आयाम नही थे!
अब ख़ुद से इंसाफ करो मन,ख़ुद से ख़ुद को माफ़ करो मन!
राजनीती से धर्म अलग है,पूर्वाग्रह को साफ करो मन!
आज राम तो कल कह दोगे,पयाम्ब्रे इस्लाम नही थे!
अदि अंत और आज राम हैं,मानस के सिरताज राम हैं!
राम ही मर्यादा पुरोषत्तम,सबके गरीबनेवाज राम हैं!
बिना राम के कोई मनोरथ,भाव कोई निष्काम नही थें!
मिथ रघुकुल के राम नही थे!
मिथ रघुकुल के राम नही थे!

(यह रचना मेरे परम मित्र और कवि डॉ० एन टी खान की सोच का परिणाम है,उनकी संस्तुति से इसे प्रकाशित कर रहा हूँ!कवि डॉ० एन टी खान होमियोपथ के योग्य चिकित्सक है और उत्तर भारत में अपनी काव्य क्षमता से उन्होंने अपनी जगह बनाई है - उमेश पाठक )

सोमवार, अप्रैल 13, 2009

ये इन्कलाब गुज़र जाने दो !

उमेश पाठक
ये इन्कलाब गुज़र जाने दो !
चढा सैलाब उतर जाने दो!
प्यास बुझती नही मैखानों में ,
तुम अपनी यादों के पैमाने दो!
दार पर मुझको चढा दो यारो,
नाम कुछ इश्क में कर जाने दो!
उनसे मिलने की तमन्ना है जवां
लगी है आस ,मगर जाने दो !
अपने बारे में कभी सोचेंगे ,
यादे आयी है चली जाने दो!
कौन अब इश्क यहाँ करता है,
जिस्म मिलते है बस दीवाने "दो"!

मंगलवार, अप्रैल 07, 2009

दर्द का हद से गुज़रना ही दवा होता है!


इन्सान की ज़िन्दगी में दर्द का बड़ा ही महत्व है.कभी दर्द हमें कमज़ोर करता है तो कभी ताकत भी देता है.बुद्धने अगर इस संसार को दुखमय कहा तो कबीर ने माया !मगर दुःख को सभी ने स्वीकार किया.नियति जब अपनी पर आती है तो भगवान राम होने के बाद भी हमें १४ सालका वनवास काटना पड़ता है.प्रकृति की सभी सुन्दरतम रचनाओं का जन्म दर्द से हो कर ही संभव होता है .
"वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजी होगी प्रथम कविता" ।
सुख और दुःख में एक अंतर्संबंध है,जिसे नकारा नही जा सकता !सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है !
"दुःख के अन्दर सुख की ज्योति,दुःख ही सुख का ज्ञान !
दर्द सह कर जनम लेता , हर कोई इंसान! "
अजीब है दिल का दर्द यारों न हो तो मुश्किल है जीना इसका ,
जो हो तो हर एक दर्द हीरा ,हरेक गम है नगीना इसका !
"ग़ालिब" ने भी इसीलिए कहा है-किसी के सोचने - कहने से क्या होता है,दर्द का हद से गुज़रना ही दवा होता है!